जा रहे 2016 के शब्द…. जयप्रकाश त्रिपाठी

 

जा रहे 2016 के शब्द…. जयप्रकाश त्रिपाठी
मुझे अलविदा कहो-न-कहो, जा रहा हूं मैं ।
आओ, गले लगा लो, फिर से आ रहा हूं मैं ।
जाने का गम है, आने की खुशी भी बेशुमार,
इस तरह खुद-में-खुद को आज पा रहा हूं मैं।
चलना मेरी नियति है, रुकना न आ सका,
खुद ही उजड़ रहा हूं, खुद बसा रहा हूं मैं।
मैं रोशनी किसी की, अंधेरा किसी का हूं,
लो, बुझ रहा हूं, और जगमगा रहा हूं मैं ।
कहते हैं, किसी का कभी सगा नहीं रहा,
रिश्ते का जाने कैसा फलसफा रहा हूं मैं।
मैं वक्त हूं, कैलेंडर हूं, टांग लो मुझे,
हर एक-एक पल तेरा सजा रहा हूं मैं।
वह सब न भुला देना, जो लाजवाब था,
मिलता हूं फिर से, अभी गुनगुना रहा हूं मैं।
@जयप्रकाश त्रिपाठी

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