नया साल 2017- मधु

नया साल 2017- मधु

..मयस्सर डोर से फिर एक मोती झड़ रहा है
..तारीखों के जीने से दिसम्बर उतर रहा है |…..
कुछ चेहरे घटे , बढ़े गुजरी कहानियों में,
लम्हों पे झिना झिना पर्दा गिर रहा है ।
गुनगुनी धूप और ठिठुरी रातें जाड़ो की,
उम्र का पंछी नित दूर और दूर उड़ रहा है ।…..फिर एक दिसम्बर गुजर रहा है
हरा कोपल लचका पिछले बसंत वो पत्ता ,
कुदरत का कायदा सिखा सूख झड़ रहा है |
चिंगारी हौले से सुलग आग बनी थी कभी ,
वो लावा किरदार राख बन उड़ रहा है |…….फिर एक दिसम्बर गुजर रहा है
मिट्टी का जिस्म एक दिन मिट्टी में मिलेगा ,
मिट्टी का पुतला किस बात पर अकड़ रहा है |
जायका लिया नही और फिसल रही जिन्दगी ,
आसमां समेटता वक़्त बादल बन उड़ रहा है |………फिर एक दिसम्बर गुज़र रहा है
( बचे चन्द दिन आपकी मनोकामना पूरी कर “विदा उपहार” देता जाए इन शुभकामनाओं के साथ ) MADHU writer at film writer”s association MUMBAI

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