यादें……ममता गैरोला

Mamta Gairola , New Delhi

यादें……ममता गैरोला 

तैर कर निकल जाती है यादें ,थाह नहीं भरती
वक़्त के दरिया में अब ,वो मुस्कराहट नहीं मिलती,
बच्चों के खिलौने भी किसी ताख पर सजते है
चाहते हुए अब वो बेफिक्री राह नहीं मिलती,
हर कदम जैसे सौदाए बाजार में खड़े मिलते हैं ,
जज्बात भी जैसे व्यापार से सजे खिलते हैं,,,,
फासले सिर्फ दीवारों में नहीं दिल में भी उतर आये हैं
सिर्फ चौंधियाहट बाहर से सजने सवरने की
दिलों में ख़ामोशी के गहरे साए हैं ,,
अजनबियत सी हो गई,अपने ही किरदार में जैसे
निस्बतें सूरत में भी,वो रवायत नहीं मिलती,,
घोल दो कोई तो शहरों की तपन में फिजा ऐसी,
क़ि चाहते हुए अब वो बेफिक्री राह नहीं मिलती,
क़ि चाहते हुए अब वो बेफिक्री राह नहीं मिलती !!!

ममता गैरोला ,,,,

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