दिल से–ममता गैरोला

दिल से–ममता गैरोला

गर्व करती है बेटी पिता पर
जो शरहद पर खड़े सभी की सुरक्षा
अपने कन्धों पर लिए सीमा का प्रहरी है

बचपन से ही पिता की छुट्टियों का इंतजार
कि साल के बारह महीनों में वो एक माह
जब पिता की ऊँगली पकड़कर
बाजार जाउंगी , गुड़िया लेने की जिद में
पापा की गोद में घूमुंगी ,,,,,,

जैसे- जैसे होश संभाला,जब माँ को देखा करती
अकेले सब कुछ सभालते हुए,घर बहार और दुनियादारी
चिट्ठी की इंतजारी में द्वार पर आँख बिछाये हुए फिर
एक बार नहीं जाने कितनी बार वो उस चिट्ठी को पढ़ती थी
फिर मोड़ यूँही तकिये के नीचे सहज संभाला करती थी

जब भी कोई ड्यूटी पर से संदेशा लेकर आया करता
उन सदेशौं में हर कोई अपना हिस्सा पाया करता
पापा का बस ये कह देना , बेटी नहीं वो मेरा बेटा है
बात यह सुन कर हिम्मत बेटी की , पर्वत सा रूप फिर धर लेती
और तभी हाथ में कलम को लेकर,नन्हे हाथों से लिख देती
पापा हम सब ठीक यहाँ पर ,फ़िक्र हमारी मत करना
जिस माँ ने हमको स्थान दिया है , तुम उसकी रक्षा करना

पापा बस एक सवाल जो मेरे मन में अक्सर उठता है
क्यों शरहद पर हर पल कोई जवान यूँ मरता है
जब भी ख़बरों पर सुनती हूँ , लोगों की संवेदनाओं को
बस फिर उबाल सा आ जाता है
भावों का फिर आखों में

पर वो क्या जाने पापा बात मेरे मन की
जब भी कोई बच्चा अपने पापा का हाथ पकड़कर चलता है
यद् बहुत आते हो पापा , मन भी बहुत मचलता है
माँ से कहती हूँ माँ कहती छुट्टी में जब आओगे ,
फिर मुझको जितना कहना है,आप मुझे सुन पाओगे ,
पर डरती हूँ जब भी अख़बारों में खबर को पढ़ती हूँ
तिरंगे में लिपटे जवान को जब घर आते में सुनती हूँ

पापा कोई जाकर उनको संदेशा मेरा देदे
घर में उनकी बेटी भी यूँ राह पिता की तकती होगी
माँ भी छुप छुप कर आँखों में , यादों को संजोती होगी
ख़त्म करो इस राग द्वेष को ,
हमको भी सुख से रहना हैं , माँ का पल्लू डांट पिता की
महसूस हमें भी करना है। ..
महसूस हमें भी करना है। ,,,,,,,,

 

 

 

 

 

 

ममता गैरोला ,,,,,

228 Comments

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