देखो ये मानव कहाँ जा रहा है …कल्पना खजुरिया, उधमपुर जम्मू

देखो ये मानव कहाँ जा रहा है …कल्पना खजुरिया, उधमपुर जम्मू

देखो ये मानव कहाँ जा रहा है

अपनी ही मानवता ठुकरा रहा है।

इसको विरासत में क्या क्या मिला था।

ये अपनी ही सभ्यता भुला रहा है।।

भेजा था मालिक ने धरती सजाने।

कुदरत ने दिए थे हज़ारौं खज़ाने।

इसने मिटा दी जहाँ से वो हस्ती।

क्या पाएगा ये तो खुदाया ही जाने।।

तबाह् करके खुश है ये इन्सानियत को।

बरसों से पौसा है हैवानीयत को।

इंसां ही इंसां से डरने लगा है।

फैला रहा है ये विरानियत को।।

ये बहनों का व्योपार करने लगा है।

इससे ममता का आंँचल सीहरने लगा है।

पिता की यहाँ क्या बिसात है अब।

ये घरों को दहशत से भरने लगा है।।

रचाया ब्याह औरत को पत्नि बनाया।

पर अपने अहंम को कभी ना दबाया।

चाहता है सीता बने उसकी पत्नि।

मगर खुद कभी राम ये बन ना पाया।।

आज हर कोई रावण बना घूमता है।

उठा दूसरे की सीता बड़ा झूमता है।

खिंचता है जब चीर द्रौपदी की सभा में।

दुषासन का माथा युधिष्ठिर चुमता है।।

रामायण से राम गुम हो चुका है।

गीता का कृष्णा कहीं सौ चुका है।

वो सतयुग वो दाृपर कब से हैं बीते।

कलयुग को लिखने वाला भी रो चुका है।।

खाली है मंदिर ईश्वर खो गया है।

पुजारी को खुद पे गु़मां हो गया है।

कहता है मानो मुझे मैं प्रभु हुं।

है अल्सायी श्रध्दा यकीं सो गया है।।

ये कैसी हैं राहें ये कैसी दिशाऐं।

ये कैसै मंज़र आंँखों में समाए।

चिखें ही चिखें लहु दिख रहा है।

किसे जा के मन की पीड़ा सुनाऐं।।

यही आज सच है अगर जान लो तुम।

समय रहते सच्चाई पहचान लो तुम।

उठो जागो जल्दी चलना बहुत है।

सफर होगा छोटा अगर ठान लो तुम।।

कल्पना खजुरिया, उधमपुर जम्मू

38 Comments

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *