शतावर–जतिंदर सागर ब्टोला, उत्तराखंड

शतावर–जतिंदर सागर ब्टोला, उत्तराखंड

क्यूं शतावर (औषधीय फसल) की खेती पहाड़ की ठंडी जलवायू मैं करना बिलकुल उचित नहीं ये तस्वीरें बरेली उत्तरप्रदेश की है ज़हाँ पर शतावरी एक अच्छी और आर्थिक रुप से लाभदायक फसल साबित हो रही है. दिक्कत तब आती है जब बाजार मांग से अधिक और बहुत जगहो पर अच्छी पैदावार बाजार भाव को नुक़सान पहूँचा देती है इसलिये किसान भाई फसल लगाने से पहले बाजार का अनुमान जरूर ले. और संकुल आधारित खेती मैं बीज भण्डारंण एवं कोल्ड स्टोर का प्रबंध राष्ट्रटीय औषधीय पादप मिशन से करवा सकते है. हर वर्ष पीली शतावरी के बीज की पूरे देश से ज्यादा मांग आती है इसकी खेती कम जगहो पर हो रही है और इस बार इसके बीज का भाव 5000 से उपर एवं ज़ड़ो का 450-700 रहा. जबकी सफेद वाली की खेती बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीशगढ़, उड़ीशा, आदि प्रदेशो मैं हो रही है. इसका बीज का भाव 800-1000 एवं सुखी ज़ड़ो का भाव 120-180 तक रहा. अब बात आती है पहाड और ठंडी जलवायू की. शतावरी की अनेक प्रजाति हैं ज़िनमे सफेद, पीली और सूप/सलाद वाली की खेती प्रमुख है. उत्तराखण्ड मै सफेद और पीली की खेती उधम सिंघ नगर, हरिद्वार, देहरादून-सहारनपुर मैं की जाती है. 3 और जंगली प्रजातिय़ां भी है. विगत कई वर्षों से इन पहली 2 खेती वाली प्रजातियों के बहुत प्रयोग किये गए और पाया की यह फसल ठंडी जलवायू मैं ना के बराबर बढ़वार देती है. पीली के परिणाम 1500 मी0 से अधिक ऊँचाई पर यह मिले की पौधे सिर्फ ज़िंदा रहते है और 3 साल बाद 100 ग्राम से अधिक नहीं देते है. इसकी जड़ो की बढ़वार के लिए नाइट्रोजन की अधिक आवश्यकता होती है जो यूरीया देकर पूरी कर सकते है. लेकिन पहाड पर यूरीया का अधिक प्रयोग जेविक खेती को बिगाड़ सकता है. और बहुत कम पैदावारं किसान भाइयो को आर्थिक नुक़सान दे सकती हैं. मिशन परियोजना मैं उत्तरकाशी मैं खेती के प्रयोग मैं फसल को सुअर से बहुत नुक़सान देखा गया था. यह भी बड़ी समस्या होगी. इसलिये सारग्रभित शव्दों मैं निवेदन है की बिना जांच पुछ के अलोवीरा की भांति पहाड पर शतावरी की खेती की जल्दी नुक़सान दे सकती है. यही सलाह अलोवीरा की खेती के लिए है. हाँ जिस दिन जेविक उत्पादों का सही मुल्य मिलना शुरू होगा फिर कम उत्पादन भी मुनाफा दे सकता है. शतावरी के बारे मैं जाने दुनिया के कल्याण के लिए भगवान ने स्त्री को बनाया, लेकिन उसके कल्याण के लिए ईश्वर ने शतावरी (ऐस्पैरागस) को बनाया। ‘शतावरी’ दो शब्दों से जुड़कर बना है – शत (सौ) और वरी (इलाज)। शतावरी एक प्राचीन औषधि है, जो स्त्रियों के स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है। शतावरी को गर्भवती महिलाओं के लिए एक श्रेष्ठ टॉनिक माना जाता है। यह गर्भ को पोषित कर गर्भवती महिला के अंगों को गर्भ धारण के लिए तैयार करती है और गर्भपात से भी बचाती है। यह मां के दूध (Breast milk) के उत्पादन को विनियमित करती है और उसकी गुणवत्ता को बढ़ाती है। यह औषधि स्त्रियों के मासिक धर्म चक्र को नियंत्रित करती है, ल्‍यूकोरिया (योनि से सफ़ेद पानी निकलना) का उपचार करती है, उनके प्रजनन अंगों को स्वस्थ रखती है, यौन विकारों से राहत दिलाती है और गर्भावस्था के दौरान व बाद में फायदेमंद साबित होती है। महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होने के अलावा, यह मधुमेह और माइग्रेन सिर दर्द के लिए भी बहुत प्रभावशाली जड़ी-बूटी है। यह व्यक्ति को तनावमुक्त कर देती है और गहरी नींद सोने में मदद करती है। यह बुखार और खाँसी में भी बहुत उपयोगी होती है। चमकदार और स्वस्थ त्वचा पाने में भी शतावरी बहुत फायदेमंद है। शतावारी मुख्य रूप से महिलाओं को स्वस्थ जीवन उपहार करने के लिए प्रयोग किया जाता है परंतु यह पुरुषों के लिए भी अत्यंत लाभदायक है। शतावरी स्वाद में कड़वी ज़रूर है परंतु पोषक तत्वों से भरी हुई है। यह एक जादुई औषधी है जो चुटकियों में शरीर को रोग-रहित बना देती है। आयुर्वेद के लेख में भी इसके उत्तम उपयोगों का उल्लेख बड़े ही स्वर्ण शब्दो में किया गया है। शतावरी को सतावरी (Satavari), सतावर (Satavar), सतमुली (Satmuli), शटमुली (Shatamuli), सरनाई (Sarnai) के नाम से भी जाना जाता है। अधिक जानकारी के लिए सवालों ? आपके अनुभवों एवं सुझावों का हमेशा स्वागत है.
HERBAL MISSION drbutolajs@gmail.com

 

65 Comments

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *