सुबह के सपने जीने की चाह–ममता गैरोला

सुबह के सपने जीने की चाह–ममता गैरोला
शाम होते ही पूरी अपवाह..
यूं फिर एक दिन गुजर जाता है ,
और वो अपनी ही बात से मुकर जाता है..

कुछ उलझे ताने बानों मे,
वो बहकी -बहकी नींद..
कुछ बिखर -बिखरेे ख्वाब कहीं ,
पल -पल में ढलती रैन……
बंदआँखों में बस रात गुजर जाती है…
और फिर एक बार वही

सुबह के सपने जीने की चाह…..

ममता गैरोला…..

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