आरजू- राकेश वर्मा, जम्मू

आरजू- राकेश वर्मा, जम्मू
कब चाहा था मैंने की तुम मुझे चाहो,
कब कहा था की तुम मुझे सराहो,
फिर भी तुम आगे बढती रही,
मेरे अरमानों में सजती रहीं,
कह सका न कभी में तुम कहती रही,
जिंदगी मेरी भी तुम्हारे हाथ बहती रही,
छोड़ती रही मंजिल को हर मोड़ पर,
तोडती रही सपनों को हर छोर पर,
तुम न आये वादा कर के भी,
आई न लौट के वादा कर के भी,
गयी थे छोड़ के नैनों में जल भर के भी,
मै नादान सोचता रहा ये बूँदें सावन बनेंगी एक दिन,
घटा बन बरसेंगी मुझ पर तिन तिन,
नहीं जान पाया कभी इस परदे को मैं।
यादों में गुज़ारे हैं मैंने कितने ही दिन,
भूल गई थीं दुनिया की रंगीनियों में तुम मुझे,
पर जानता था जी नहीं सकोगी मेरे बिन,
देखा जो आज बरसों के बाद,
तुम मुझसे नज़र भी नहीं मिला पा रही थी,
ऐसा क्यों लगा की कहीं घुटती जा रही थी,
बहुत चाहा खुश हो जाऊं तुम्हारे इस हाल पर,
मुस्कुराऊं तुम्हारी इस लडखडाती चाल पर,
गिन गिन के करूँ हिसाब आंख के हर मोती का,
लूँ बदला जागती रही इन आँख सोती का,
पर आज भी उदास हो गया मैं।
दूर हो कर भी तुम्हारे पास हो गया मैं ,
आज भी मन हुआ लट संवार दूँ,
आगे बड़ कर तुम्हारी नज़र उतार दूँ,
आज भी मान लूँ तुम्हारी कही हर बात,
आज भी मान लूँ तुम दोगी साथ,
मैं खुश दिख सकता हूँ दिखाने को,
पर कहने का कोई मौका,
दे नहीं सकता ज़माने को……Rakesh Verma, Jammu

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