मेरे आँगन में–ममता गैरोला

मेरे आँगन में–ममता गैरोला
समेटे आँचल में बच्चों को
सुबह आसमाँ को तकती हूँ
कि कुछ फैला दे रौशनी,
मेरे आँगन में,,, ऐ !!! सूरज ,
कि ठण्ड में आज भी गलन
हर बार जितनी हैं।
मैं सह लूँगी तेरी इन शीत लहरों के थपेड़ों को
मगर बचपन मेरे आँगन जो पलता है
मुझे तो फ़िक्र उसकी है,,,
कहा से ढूंढ कर लाऊँ
तपन, जो आराम दे उनको,,
रखूं आँचल में कब तक कि
मुझे फिर काम कुछ होगा
थपेड़े जिंदगी के हैं हजारों
उन्हें एहसास न होगा
मगर सर्दी की ठंडक का उन्हें एहसास पूरा है
चिपक कर जब गले लगकर
मुझे फिर रोकते हैं वो
जिंदगी के हजारों फलसफों का पाठ फिर उनको पढ़ाती हूँ
ये भी जानती हूँ बचपन है,,क्या समझेगा फ़सानेजिंदगी के
फिर सोच कर मन ही मन तेरी ही राह तकती हूँ,,
कि कुछ फैला दे रौशनी,
मेरे आँगन में,,, ऐ !!! सूरज ,
कि ठण्ड में आज भी गलन
हर बार जितनी हैं।
ममता गैरोला ,,,,,
Mamta Gairola lives in New Delhi, she has done MA, MlibSc from Garhwal University. She is a writer, poetess and a teacher. Thanks are due to Mamta for her contribution

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