सत्य का उदघाटन…Madhu

सत्य का उदघाटन…Madhu

सत्य का उदघाटन अपने साथ ढेर परिणाम लाता है । विषाद की पीड़ा, सत्य के अवतरित होने पर ठगा जाने की खीज़, अँधेरे में रहने का पश्चाताप । सत्य के साक्षात्कार से स्वयं से घृणा । असत्य पर विश्वास की ग्लानि, सत्य को न समझ पाने की अज्ञानता पर आक्रोश । हाँ ! सत्य का उदघाट्न अपने साथ कितने परिणाम लाता है । आँखों के सामने से छटता जाए जैसे धुँआ, प्रकाशित हो स्पष्टता देता जैसे अन्धेरा कुआँ, असमंजस के सारे धूमिल चित्र , भरम, दृश्य मृगतृष्णाओ को धरातल पर आवरणहीन करता , खोखली पूर्वधारणाओं दो फाड़ करता है । सत्य केवल सत्य होता है बिना दो मत के , ठोस, निडर , निर्लज़्ज़ होता है । साहस है गर पूर्वनियोजित स्वप्निल संसार को तहस देखने का । टटोल कर एक सिरा खीच देना झूठ के रेशमी डोर का । सत्य कुरूप, निर्दयी , कठोर ,पथरीला है । हो गर इस रूप को स्वीकारने के इच्छुक पथ आगे स्थायी , स्पष्ट, सुखद ,भयरहीत ,सरल होंगे। झूठ के मायावी चिलमन के पार सत्य का “मौन शोर” अनहद और सुखदायी है। सत्य को नसों में घुलने का समय , सहनशीलता का हौसला , आत्मसात करने की चेतना , स्वीकारने की युक्तियाँ दो । सत्य सहज, शाश्वत ,निडर ,संयमित , निर्विववाद, सुखद और हाँ अत्यंत सुन्दर है। Madhu writer at film writer’s association Mumbai

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