बिश्व गौरैया दिवस– विलुप्ति की कगार पर गोरैया— नन्दनी बर्थवाल नई दिल्ली

बिश्व गौरैया दिवस– विलुप्ति की कगार पर गोरैया— नन्दनी बर्थवाल नई दिल्ली

घिन्डुड़ी जिसे हम गौरैया के नाम से भी जानते हैं , कभी यह हर घर की रौनक हुआ करती थी। मुझे याद है जब हम छोटे हुआ करते थे ये गोरैया घर के अंदर अपना घोंसला बनाया करती थी बाहर आंगन में अक्सर इसे चुगते देखा करती थी। इसकी आवाज़ सुबह का अलार्म हुआ करती थी , सुबह सबेरे इसकी गोरैया की मीठी आवाज़ हमें जगाया करती थी। धीरे धीरे आज यह आवाज लुप्त होती जा रही है, यहाँ तक आज गोरैया विलुप्ति की कगार पर आ खड़ी है। पिछले दो दशकों में खासकर शहरों से गौरैया बिल्कुल विलुप्त होती जा रही हैं। अक्सर घरों के आस-पास मुंडेरों पर, पेड़ों पर गौंरैया को दाना चुगते आपने देखा ही होगा, लेकिन बढ़ते शहरीकरण और रासायनिक प्रदूषण और रेडिऐशन के चलते हमारे बीच इस सुन्दर पक्षी की संख्या कम होती जा रही है। गौरैया एक सामाजिक पक्षी है, यह अक्सर इंसान के साथ रहना पसंद करती है। आज हम शहरीकरण के चलते कच्चे घर से पक्के घर में आ गए, गौरैया का आवास खत्म कर दिया और दूसरी तरफ मोबाइल टावर , रसायनिक प्रदूषण आदि के कारण यह सुन्दर पक्षी अपना आवास ही नही बना पा रहा जिसके लिये हम सब जिम्मेदार हैं। इस मामले में शोध कर चुके पशु चिकित्सकों का कहना है कि शहरों में लगातार हो रहे प्रदूषण और रेडिऐशन की वजह से गौरैया पक्षी की प्रजाति पर बुरा असर पड़ा है और ये धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। पशु चिकित्सक व शोधकर्ता डा.वन्दना यादव का कहना है पिछले 10 सालों में गौरैया की संख्या में पचास फीसदी की गिरावट आई है। मोबाइल टावर से निकलने वाले रेडिऐशन से गौरैया का प्रजनन व अण्डे देने की क्षमता बुरी तरह प्रभावित हुई है। इसके अलावा किटनाशकों के इस्तेमाल से ऐसे कीड़े नष्ट हो गए है, जिन्हे गौरैया अपने बच्चों को खिलाती है। वहीं पंछी प्रेमियों का कहना है कि सरकार द्वारा गौरेया दिवस मनाने से गौरैया का संरक्षण नहीं हो सकता है। ग्रामीण इलाकों में अभी गौरेया मिलती हैं, लेकिन जल्द ही इनके संरक्षण के उपाय नहीं किए गए तो इस पक्षी को भविष्य में देख पाना असम्भव हो जाएगा। दिल्ली जैसे बहु आवासीय इलाकों में आज गौरेया को देखना एक सपना बन कर रह गया है। आज भी जब मै गढ़वाल जाती हूँ तो कई बार गोरैया को दखने केअवसर मिल जाता है।पर लगता है शायद यह भी ज्यादा देर तक ना चले। गढ़वाल एक वन्य क्षेत्र है, यहाँ के कवि, गीतकार, साहित्यकार अपनी अपनी कोशिश में लगे हुए हैं इस प्राकृतिक धरोहर को बचाने के लिये, ऐसे में गौरैया पर एक गढ़वाली गीत का वर्णन में कर रही हूँ, जो कभी पुराने लोगों से सुना करती थी । फुर्र घिन्डुडी आजा, पधानु का छाजा । 20 मार्च 2010 को Nature Forever Society ,इंडिया द्वारा इकोसिस Action Foundation फ्रांस के साथ मिलकर विश्व गौरैया दिवस मनाया गया। इस दिवस का महत्त्व गौरैया के विलुप्तिकरण पर एक संदेश जनहित में जारी करना था । इस अवसर पर जागरूक शिविर, प्रतिेयोगिताओ आदि का आयोजन किया गया। Nature Forever Society मुहम्मद दिलावर जो नासिक के रहने वाले है उनके द्वारा शुरू की गई जिनको Times की तरफ से 2008 में Heros of the Environment से पुरस्कृत किया गया। आज बिश्व भर में गोरैया दिवस 20 मार्च को मनाया जाता है। इस दिवस का मुख्य आकर्षण यह भी है की जो भी शोधकर्ता गोरैया पर काम कर रहे हैं वह सब एक जुट हो कर प्रयास करें और यह संदेश जन जन तक पहुंचाए।

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