ऊँचाइयों से प्यार है मुझे ..Vijaya Pant Tuli, Uttarkashi Uttrakhand

ऊँचाइयों से प्यार है मुझे ..Vijaya Pant Tuli, Uttarkashi Uttrakhand
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एवरेस्ट पर फतह पाने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल की सबसे करीबी माउटेनियर विजया पंत तुली की उपलब्धियों को नकारा नहीं जा सकता . ऊँचाइयों का अनुभव उनके लिए कितना रोमांचक रहा?
कमला बडोनी जी का ये साक्षात्कार उनके चाहने वालो के लिए ….>
कहते है पूत के पांव पालने मे ही नजर आ जाते है
माउंनटेनियर विजया पंत तुली के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. स्पोर्टस मे अव्वल विजया पंत को स्पोर्टस से जुडी सभी गतिविधियां आकर्षित करती थी . उनकी मंजिल कहां है , ये तो वो नहीं जानती थी, लेकिन उनके सपने बहुत ऊँचे थे. पहाड को एक साधारण – से परिवार की लडकी माउंनटेनियर कैसे बन गई? कुछ इस तरह बताया विजया पंत तुली ने:

सोचा ना था माउंनटेनियर बनूंगी >

जब मै 7वीं 8वीं मे पढती थी, तब मैरे साथ एनआईएम के प्रिंसिपल की बेटी रेखा शर्मा पढती थी. उसके साथ मेरी अच्छी दोस्ती थी और मै अक्सर मै उसके घर जाती थी. वहाँ मै देखती थी कि कुछ लोग पीठ पर कुछ लटकाए हुए कहीं जाते है. मै उन्हें बडी ललचायी नजरों से देखती, पर कभी पूछने का साहस नहीं हुआ कि वे सब कहां जाते हैं. सुंदरलाल बहुगुणा ( चिपको आंदोलन ) अक्सर हमारे घर आते थे. जब मै बीए मे पढ रही थी और कॊलेज की स्पोर्टस चैम्पियन बनी, तब उन्होंने मुझे कहा, “बेटा, तुम पर्वतारोहण मे जाओगी, तुम्हारी फीस मै कॊलेज से दिला दूंगा, ” मै खुश तो बहुत थी, लेकिन माता -पिता इजाज़त देंगे या नहीं, ये सोचकर असमंजस मे थी. फिर सुन्दरलाल बहुगुणा जी ने मैरे माता -पिता से बात की और उन्हें मना लिया. मेरा फार्म भरने से लेकर सारी औपचारिकताएं उन्होनें ही पूरी की. मैने कभी सोचा भी नहीं था कि मै माउंटेनियर बनूंगी.

साथ नहीं रहता था हमारा परिवार

मै बहुत साधारण परिवार से हूँ, लेकिन मेरे माता -पिता ने हमे बहुत अच्छे संस्कार दिए. वो अपनी पीढी से बहुत आगे की सोच रखते थे. उस समय जब लोग अपनी बेटियों को पढाना -लिखाना भी जरूरी नहीं समझते थे, उन्होंने मुझे पर्वतारोही बनने की इजाजत दी. मेरे माता-पिता दोनो शिक्षक थे और दोनो की पोस्टिंग अलग -अलग जगहों पर थी, इसलिए हम सब भाई -बहन एक साथ नहीं रह पाते थे. कुछ मां के पास तो कुछ पिता के . मै अपने पिता के पास रहती थी और घर के सभी काम करने के साथ -साथ पढाई करती थी.

अंग्रेजी ने रूलाया

उत्तराकाशी कॊलेज से उत्तराखंड की मै पहली लडकी थी जो पर्वतारोहण मे एनआईएम जा रही थी. वहां जाकर जब मैने पहला लेक्चर अटेंड किया, तो मेरी बोलती बंद हो गई, लेक्चर अंग्रेजी ने हो रहा था. हमारे कॊलेज मे उस समय इंगलिश न के बराबर होती थी. जब कुछ मे नहीं आया तो मै रोने लगी. उस समय वहां के वीपी (वाइस प्रिंसिपल) मेजर भट्टाचार्य थे. मै रोते हुए उनके पास गई और बोली. ” मुझे घर जाना है, मुझे अंग्रेजी नहीं आती. ” मेरी बात सुनकर वो मुस्कुराते हुए बोले, “अरे तुम भी वीपी ( विजया पंत ) और मै भी, फिर तुम घर कैसे जा सकती हो? ” फिर उन्होंने ट्रेनीज से कहा, “सारे ट्रेनीज सुन लो, कोई भी इस वीपी से इंगलिश मे बात नहीं करेगा, सब हिंदी मे बोलेंगे, ” उसके बाद सारी लडकियां मुझसे टूटी -फूटी हिंदी मे बात करने लगीं. एक लडकी ( अर्चना भट्टाचार्ज , जो बाद मे मेरी अच्छी सहेली बन गई ) मेरे पास आई और बोली, ” ऐ बिजोया, रोने का नहीं, हम तुमको हिन्दी बोलता. ” फिर तो मै सभी के साथ घुल -मिल गई.

पहाडों की ऊँचाईयां नापना चाहती थी

मैनें पढाई -लिखाई तो एक शिक्षक बनने के लिए की, पर ख्वाहिश यही रही कि मै पहाडों की हर दुर्लभ ऊंचाई नाप सकूं इसलिए बीए व एम एड की पढाई करने के बाद मैनें अपना पूरा ध्यान ट्रेकिंग पर केंद्रित कर दिया. मैने इस क्षेत्र में कई प्रशिक्षण लिए – उत्तरकाशी के नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग से प्राथमिक प्रशिक्षण पर्वतारोहण व ट्रेकिंग में लिया, इसी का एक एडवांस कोर्स भी मैने इसी संस्थान से किया, जम्मू और कश्मीर के गुलमर्ग के स्कीईंग संस्थान से स्कीईंग का प्रशिक्षण लिया, इसके बाद गढवाल विश्वविद्यालय से स्काउट गाइड का कोर्स किया, एस एस बी राइफल्स शूटिंग ट्रेनिंग भी ली, मेरठ नेशनल एडवेंचर फाउडेंशन से एडवेंचर कोर्स किया.

बछेंद्री पाल की उपलब्धि पर पूरी टीम खुश थी इस क्षेत्र मे टीमवर्क बहुत मायने रखता है इसलिए बछेंद्री दी ने जो अचीव किया उससे हम सब खुशी से फूले नहीं समा रहे थे, पर टीम के अन्य स्ट्रॉन्ग सदस्य दुखी भी हुए, क्योकि अन्य किसी को फिर मौका नहीं मिल पाया. मैने एवरेस्ट तो नहीं क्लाइम्ब किया. पर मेरे अचीवमेंट को नकारा नहीं जा सकता, शायद वहाँ पर मैने ही पर्वतारोहण को घर -घर पहुँचाया था.

यूं हुई सेवन सिस्टर्स एडवेंचर क्लब की शुरूआत

बछेंद्री दी और मै जब लेडी इंस्ट्रक्टर बनकर एनआईएम गए, तो वहां नेशनल एडवेंचर फाउडेंशन के डायरेक्टर ब्रिगेडियर ज्ञान सिंह ने हमें भागीरथी -सेवन सिस्टर्स एडवेंचर क्लब शुरू करने के लिए एन. ए. एफ. का आवेदन पत्र भरने के लिए कहा. यह योजना प्रशिक्षित लडकियों और महिलाओं की आर्थिक चिंताओ का ध्यान रखने के लिए थी . चंद्रप्रभा ऐत्वाल, बछेंद्री पाल, विजया पंत, आशा पंत, अनिता रेखी , उमा भट्ट और उत्तरा पंत हम सात लडकियां इस क्लब की कार्यकर्ता थीं.

और मैनें शादी कर ली

उस जमाने में इंटर कास्ट मैरिज अपने आप ने एक बहुत बडा कदम था, मैने वो कदम भी उठाया. दरअसल, हमारे पास एडवेंचर कोर्स के लिए टाटा का ग्रुप आया हुआ था, जिसमें मिस्टर तुली भी थे. कोर्स के दौरान तो उन्होनें मुझसे कुछ नहीं कहा, लेकिन कोर्स के खत्म होते ही उन्होनें मेरे सामने शादी का प्रपोजल रखा. पहले तो मै घबरा गई, फिर मैने कहा अगर मां -पिताजी हां कहेंगे तो मै तैयार हूं. उसके बाद कुछ परेशानियां आईं, लेकिन हम दोनो के परिवार हमारी शादी के लिए मान गए. बछेंद्री दी और मैरे भाई -बहनो ने मां – पिताजी को मना लिया था. हमारी शादी आर्य समाज मंदिर देहरादून मे मात्र 1 -1 अंगूठी मे हुई, हमने प्रतिज्ञा की था कि बिना दहेज के शादी करेंगे.

जब टीवी पर दिखे हम

जब टीवी पर हमारा प्रोग्राम दिखाया जा रहा था, उस समय उत्तरकाशी मे टीवी नहीं थी. तब मै और बछेंद्री दी मेरी बहन के घर देहरादून टीवी देखने आए थे. तब मे पहली बार ट्रेन मे बैठी थी.

दहेज प्रथा के खिलाफ हमारी आवाज

हमने देशभर की लडकियों के साथ मिलकर सिग्नेचर कैंपेन चलाया था कि कोई भी दहेज नहीं देगा. हम मे से किसी ने भी शादी मे दहेज नहीं दिया.

ऊंचाइयों का शानदार सफर

सबसे बडी सफलता रूद्र गेरा पीक के पास 21,300 फीट ऊंचाई पर पहुँचने के रूप मे 1999 में मिली.

ठीक एक वर्ष बाद ही केदार डोम मे 22,400 मीटर की ऊंचाई पर पहुँचकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया.

आखिरी पर्वतारोहण लगभग 20,000 फीट तक की ऊंचाई पर जाना था.

1982 मे गंगोत्री से बद्रीनाथ तक कलिंदी पास होते हुए अपनी ट्रेकिंग पूरी की.

1985 में टिस्को ग्रेज्युएट ट्रेनीज के साथ उत्तरकाशी से केदारनाथ तक ट्रेकिंग की.

अन्य उपलब्धियाँ

1983 से 1985 तक सेवन सिस्टर्स क्लब की सचिव रहीं.

यूपी बोर्ड के पाठ्यक्रम में बछेंद्री पाल और इनके बारे में भी पढाया जाता है.

रेडियो और टीवी पर कई प्रस्तुतियां दी.

वेस्ट बंगाल के हल्दिया पोर्ट के चर्च स्कूल में क्रीडा शिक्षिका के रूप मे काम किया.

1996 से 2001 तक उडिसा में पारादीप पोर्ट मे एढोक पर हिंदी शिक्षिका के रूप मे अध्यापन कार्य किया.

स्कूल व विश्वविद्यालय स्तर पर सामाजिक कार्यो के लिए अखिल भारतीय छात्र संघ द्वारा सम्मानित.

बतौर एथलीट कई पुरस्कार प्राप्त किए.

1994 मे मुम्बई व पुणे के एडवेंचर क्लब के साथ रॉक क्लाइंबिंग कार्यक्रम तैयार किया.

1982 से 1985 में इसी तरह का कार्यक्रम ओएनजीसी के बच्चों व कर्मचारियों के साथ भी चलाया. इन संस्थानों में गेस्ट इंस्ट्रक्टर के रूप मे काम किया.

वो कहने लगे लडकी देखी – लडकी देखी

एकबार बार जब हम ट्रेकिंग के लिए गए थे तो वहां हमें देखकर आर्मी के कुछ नौजवान लडकी देखी -लडकी देखी चिल्लाने लगे. उन्हे देखकर हम थोडे डर गए, तो उन्होनें बताया कि बहुत समय से वो अपने परिवार से नहीं मिले है और न ही उन्होंने किसी लडकी को देखा इसलिए उन्होने ऐसा किया. फिर हमने रातभर उनके साथ अंताक्षरी खेली. आज जिस तरह प्रिति जिंटा, शाहरुख खान जैसे कलाकार जाकर जवानों का मनोरंजन करते है, वैसे उस समय हमने भी किया था.

शादी के बाद बदल गई जिंदगी

लगभग सभी वर्किंग वूमेन्स की तरह शादी के बाद मेरे करियर मे भी कुछ समय के लिए विराम लग गया. मै पति, बच्चे, घर -परिवार में इस कदर व्यस्त हो गई कि करियर के लिए समय ही नहीं मिला. अब जब मैरे दोनो बच्चे बडे हो गए हैं, तो मै कई सामाजिक गतिविधियों में हिस्सा लेती हूं.
( अपनी चिर – परिचित मुस्कान बिखेरते हुए उन्होंने कहा ) अभी तो बहुत काम करना है, मै इतनी जल्दी थकने वालों मे कहां हूं!..

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