हर्षिल, विल्सन, स्टोक्स एवं सेब–डा0 राजेन्द्र डोभाल

हर्षिल, विल्सन, स्टोक्स एवं सेब–डा0 राजेन्द्र डोभाल

सामान्यतः मैं उत्तराखण्ड के पारम्परिक बहुमूल्य उत्पादों के बारे में लिखता हूं जिसका मकसद आम जनमानस को उत्तराखण्ड के पारम्परिक बहुमूल्य उत्पादों एवं जंगली उत्पादों के वैज्ञानिक पहलुओं तथा उनकी व्यवसायिक क्षमता से रूबरू कराना है जिससे उत्तराखण्ड के इन बहुमूल्य उत्पादों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी एक नयी पहचान मिल सके। इस कड़ी में आज एक प्रसिद्ध व्यक्तित्व के कुछ रोचक पहलुओं से अवगत करा रहा हूँ जिसका नाम फ्रेडरिक ई0 विल्सन है। वैसे तो उत्तराखण्ड में सेब की विल्सन प्रजाति के बारे में तो सब ने सुना ही होगा परन्तु यह जानने योग्य है कि विल्सन सेब किससे नाम पर है तथा विल्सन कौन है ? आइये इस लेख के माध्यम से इसके कुछ रोचक पहलुओं से अवगत होने का प्रयास करते हैं।

विल्सन उत्तराखण्ड हिमालय में स्थानीय लोगों तथा पर्यटकों के बीच आज भी एक कहानी के रूप में जाना तथा सुना जाता है जिसमें पहाड़ी विल्सन तथा गुलाबो देवी का अक्सर जिक्र किया जाता है। पिछले कई शताब्दियों से इस किवदन्ती की ताजगी तथा रोचकता थोड़ी भी फीकी नहीं हुई है। पहाड़ी विल्सन एक साहसी व्यक्तित्व था जिसे अपनी शानों-शौकत के लिये राजा विल्सन के नाम से भी जाना जाता था। रूपयार्ड किपलिंग के शब्दों में उन्नीसवीं सदी में विल्सन की कई साहसिक कहानियां बताती हैं कि वह जो शानो-शौकत का जीवन जीता था उसे राजाओं को भी ईर्ष्या होती थी और भागीरथी घाटी में बसने वाला पहला श्वेत व्यक्ति था। यह कहा जाता है कि 1857 के सैनिक विद्रोह के बाद विल्सन ने ब्रिटिश सेना को त्याग दिया और टिहरी गढ़वाल के राजा से शरण पाने के लिये मुलाकात की लेकिन तत्कालीन राजा अंग्रेजो के प्रति विश्वसनीय होने से विल्सन को शरण देने से मना कर दिया। विल्सन वहां से भागीरथी नदी के किनारे-किनारे सुदूरवर्ती देवदारों से आच्छादित जंगलों से होकर मुखवा गांव (हर्षिल के समीप) में पहुंच गये जहां एक परिवार द्वारा शरण दी गयी। तत्पश्चात वहीं पर पहले राईमाता तथा उनकी मृत्यु के पश्चात गुलाबो देवी से विवाह कर बस गये। विल्सन द्वारा जंगली जानवरों का शिकार कर जीवन-यापन किया गया तथा समाज के बीच में अपना स्थान भी बनाया। बाद में शिकार पर प्रतिबंध होने के बाद घनाघोर देवदारों से आच्छादित जंगलों से लकड़ी का व्यापार शुरू कर दिया। विल्सन पहले व्यक्ति थे जिन्होंने नदी की धाराओं के प्रवाह के साथ लकड़ी का परिवहन प्रारम्भ किया तथा इसी व्यापार के फलस्वरूप विल्सन राजा विल्सन के रूप में प्रचलित हुये। कहा जाता है कि भैरव घाटी का 350 फीट का ससपेन्सन पुल भी विल्सन की ही सोच थी जो आज भी उपयोग में है तथा कई वन विभाग के अतिथि गृह भी विल्सन के ही कॉटेज हुआ करते थे। विल्सन के पास उस समय लगभग सन् 1840 में जब हर्षिल से मसूरी आते थे तो रास्ते में रात्रि विश्राम के लिये अनेक स्थानों पर जैसे झलकी, धनोल्टी, काणाताल, भल्डियाना, धराशू, नौकरी, उत्तरकाशी, मनेरी तथा गंगनानी में अपने विश्राम गृह थे जो बाद में वन विभाग द्वारा विभागीय विश्राम गृह बनाये गये। विल्सन द्वारा मसूरी में भी चार्ली विले नामक आलीशान होटल में बनाया गया जो वर्तमान में भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के लिये प्रशिक्षण अकादमी है। कई कहानियों में स्थानीय लोगों द्वारा आज भी कहा जाता है कि पूर्णिमा की रात उस क्षेत्र में घोड़े की टाप तथा विल्सन की आवाज सुनाई देती है।

विल्सन की तेजी से बढते लकड़ी व्यापार ने उन्हें धनी व्यक्तियों में शुमार कर दिया। तत्पश्चात विल्सन द्वारा हर्सिल की जलवायु व भौगोलिक स्थिति तथा उपजाऊ मिट्टी को देखते हुये सेब, आलू तथा राजमा उगाने की शुरूआत की गयी। कहावत है कि न्यूटन का सेब के बाद विल्सन का सेब खूब प्रसिद्ध है। आज भी हर्षिल में विल्सन सेब की प्रजाति मौजूद है तथा हर्सिल की राजमा तो देश भर में प्रसिद्ध है जिन्होनें वहां पर नकदी फसल का रूप लेकर आजीविका संवर्द्धन में सराहनीय योगदान दिया है। विल्सन ने इन नकदी फसलों के माध्यम से वहां पर नकद अर्थव्यवस्था की शुरूआत तब की, जब वस्तु विनियम भी प्रचलन में नहीं था और पहाड़ी लोगों को अनुकूल जलवायु के अनुसार फसल विविधता तथा फसल विनिमय से अवगत करवाया जो आज भी प्रचलन में है। रॉबर्ट हचिंसन की कई पुस्तकों में ”द राजा ऑफ हर्सिल“ में विल्सन को विस्तृत वर्णन मिलता है। बेशक कई साहित्यों में विल्सन को हीरो तथा कुछ में विलेन के रूप में जाना गया परन्तु यह सत्य है कि विल्सन द्वारा ही सेब तथा अन्य नकदी फसलो से इतनी दूरस्थ भागीरथी घाटी को भी समृद्ध बनाया गया।

ऐसे ही कुछ साहित्य एक और पहाड़ी राज्य हिमाचल में सेब के परिचय के बारे में है। हिमाचल में अगर सेब एवं औद्यानिक फसलों का श्रेय अगर दिया जाता है तो डा0 वाई0एस0 परमार तथा स्टोक्स परिवार का नाम लिया जाता है। डा0 वाई0एस0 परमार से पूर्व हिमाचल में सेब के परिचय का श्रेय स्टोक्स परिवार को जाता है जिसमें सत्यनंद स्टोक्स (16 अगस्त, 1882 – 14 मई, 1946) जो एक अमेरिकी थे के द्वारा हिमाचल में सेब की खेती का आगाज किया था। सत्यनंद स्टोक्स अमेरिका में एक सफल व्यवसायी थे जिनके परिवार में ही शैमुअल इंवास स्टोक्स का जन्म हुआ और वह चाहते थे कि उनका बेटा भी व्यवसाय के क्षेत्र में भी आगे बढ़े। लेकिन 22 वर्षीय सैमुअल को पिता के व्यवसाय में कोई दिलचस्पी नहीं थी तथा 1904 में शिमला के सुबथू में कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिये भारत आ गये तथा वहां पर कुष्ठ रोगियों की सेवा करने में लग गये। 1912 में सैमुअल ने एग्नस नाम की एक राजपूत ईसाई लड़की से विवाह कर लिया तथा गांव के पास ही खेत का एक हिस्सा खरीदकर वहीं बस गये और खेती प्रारम्भ की। सैमुअल ने खेती में सुधार के लिये स्थानीय लोगों से ज्ञान अर्जन कर खुद को भी खेती के कार्य में लगा दिया जिसको नयी ऊँचाईयों तक ले गये। सन् 1915 में एक अमेरिका यात्रा के दौरान जिसमें सैमुअल स्टोक्स ने लूसीयाना में स्टोक्स ब्रदर्स के द्वारा पेटेंट किये जाने वाले लाल एवं स्वादिष्ठ सेब की नर्सरी को शिमला हिल्स में विस्तार की योजना बनाई जिसके पश्चात सन् 1916 में कुछ सेब के पौधे खरीदकर भारत लाये और अपने खेतों में एक बागान विकसित कर दिया। तत्पश्चात 05 साल बाद उनकी मां के द्वारा सैमुअल को करिश्मेश उपहार के रूप में अमेरिका से गोल्डन सेब की पौधे भेजे और ऐसे ही हिमाचल में सेब उत्पादन में दिनो-दिन विस्तार होता गया तथा नये-नये सेब के बागान विकसित हो गये।

आज भी हिमालयी राज्यों में औद्यानिक तथा व्यवसायिक क्षमता वाले फसलों का विकास तथा विस्तार के लिये ऐसे ही जूनूनी व्यक्तित्व की दरकार है जो हिमालयी राज्यों की जलवायु, भूमि तथा प्राकृतिक संसाधनों का समन्वय कर एक नई ऊँचाई प्रदान कर सके।

डा0 राजेन्द्र डोभाल
महानिदेशक
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद
उत्तराखण्ड।

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