Poem -Jai Prakash Tripathi

 

Poem-Jai Parkash Tripathi, New Delhi

हुई शाम मेरी सवेरे-सवेरे ।
कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ।
चला था जहां से, वहीं का वहीं हूं,
अकेले-अकेले मैं हूं भी, नहीं हूं,
स्वयं इस तरह क्यों कहीं-का-कहीं हूं
मैं कितना गलत हूं, मैं कितना सही हूं
रुलाते बहुत हैं सफर के अंधेरे
कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ।
किया जिंदगी भर धुनाई-बुनाई,
कटाई-छंटाई, सिलाई-कढ़ाई,
फटे-चीथड़ों से सुई की सगाई,
मरम्मत कोई भी नहीं काम आई,
लगाता रहा निर्वसन वक्त फेरे,
कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ।
उगाएं जो जंगल हमारे वतन में,
सगे हैं वे सबसे सियासी चलन में,
जगाते रहे खौफ जन-गण के मन में
चमकदार मणि नागराजों के फन में
थिरकती रहीं नागिनें मरघटों पर,
बजाते रहे बीन बूढ़े संपेरे,
कोई क्यों नहीं चल रहा साथ मेरे ।

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